भारत के किसान का संघर्ष

 

ये एक ऐसी महिला की कहानी है, जो मुझे पंजाब के मालवा बेल्ट के एक बहादुरपुर गाँव में मिली|पंजाब वैसे तो हरित क्रांति के लिए जाना जाता है, लेकिन पंजाब की एक हकीकत यह भी है कि वहाँ का किसान आज बेबस और लाचार है| बढ़ते कर्ज के कारण वे सिर्फ आत्महत्या का ही विकल्प अपना रहा है|मैं कई किसानो से मिली, उनके दुःख सुन कर मुझे मेरे दुःख छोटे लगने लगे| ऐसे भी किसान परिवार मिले जहाँ सिर्फ महिलाएँ ही घर चला रही थी क्योंकि घर के सभी पुरषों ने ज़हर खा कर अपनी जिंदगी को अलविदा कह दिया था| अगर अन्न देने वाले की ही थाली खली हो तो यह देश कैसे आगे बढ़ सकता हैं? मैंने इन वर्षो में जितने भी  लेख किसानो की आत्महत्या पर पढ़े है, उनकी गंभीरता मैंने इन किसान परिवारों से मिलने के बाद जानी|

जिन महिला की मैं बात करने जा रही हूँ, वह वृद्ध थी और अपने दो पोतो के साथ रहती थी|पति पहले ही गुज़र गए, बेटे ने खेती के लिए लिया लाखो का कर्ज नहीं चूका पाने के कारण आत्महत्या कर ली और बहुँ कैंसर की शिकार हो गई|
जब  मैं  उनके घर पहुंची तो देखा कि घर के इतने सारे लोग तो दीवार पर लगे फोटो फ्रेम  में अपनी जगह बना चुके थे| इसके आगे में कुछ सोच पाती, तभी वह महिला आवाज़ देती हुई अंदर आई|मुझे पंजाबी तो इतनी नहीं  बोलनी आती लेकिन सब के बीच रहकर, दुःख-सुख की बातें करते करते थोड़ा बोलने भी लग गई और समझने भी|मैंने उनसे उनका नाम पूछा, तो सबसे पहले मुस्कुराते हुए वह बोली , “पहले बैठ जाईये, क्या लेंगी चाय या पानी?”|फिर आखिर में बोली, “मेरा नाम सुखदेव कौर है”|मैंने चाय के लिए नहीं कहा पर इतना प्यार देखते हुए पानी ले आने को ज़रूर कहा| इतने में वो पानी ले आई और मुझे चारपाई पर बिठा कर खुद नीचे ज़मीन पर बैठ गई|मैंने कहा,”अगर आप जमीन पर बैंठेंगी , तो में भी आप के साथ आकर बैठूँगी”|फिर हुआ यह कि, हँसते हुए वह मेरे साथ आ कर बैठी और अपने कर्ज की समस्याएँ बताने लगी|खेती के कारण उन्होंने अपने पुरे परिवार को खोया, इतना कर्ज़ ब्याज के कारण बढ़ता जा रहा था और जो खेती की ज़मीन ठेके पर थी उसकी आमदनी से सिर्फ अनाज का खर्चा ,बच्चो की स्कूल फीस और ब्याज ही भरा जाता था क्योंकि कुछ और बचता ही नहीं था|

इतना सुनने के बाद मुझ से रहा नहीं गया और मैंने उन्हें ज़ोर से गले लगा लिया| एहसास ऐसा था, जैसे जब कभी मैं अपनी माँ को जोर से गले लगा लेती हूँ| जब जाने का वक़्त आया ,अलविदा कहना मुझे रास नहीं आया और मैंने एक संकल्प लिया कि मैं वापस इसी गांव में, सुखदेव कौर से मिलने ज़रूर आऊंगी|उनकी आँखों में जो मैंने नरमी देखि शायद वो ही एक चीज़ है जो मुझे मेरे कर्तव्य की ओर खींचती हैं| आज भी ऐसा लगता हैं, कि जब जाऊँगी तो वो अपने घर के दरवाज़े पर ही खड़ी हुई मिलेंगी| ऐसी परिश्रम भरी है भारत के किसानो की जिंदगी के आप और मैं अपने जीवन में कितनी भी मेहनत कर ले लेकिन उनके खून पसीने की लागत से हुई फसल की मेहनत से तुलना नहीं कि जा सकती|

यह कहानी उन किसानो को दर्शाती है, जो हम सबके परिवारों का ख्याल रखते है, लेकिन उनके खुद के परिवार गुम हो जाते हैं|यह कहानी संघर्ष की है, एक समय की रोटी की है| यह कहानी ज़िन्दगी की लड़ाई कि है, जिसके बारे में  सरकारों ने सोचना बंद कर दिया है| इसका हल, सिर्फ कर्ज माफ़ी से नहीं बल्कि एक दूसरी हरित क्रांति से ही संभव है| सिंचाई कि व्यवस्था , सही मात्रा एवं दाम में  किसानो को खाद्य-पदार्थ उपलब्ध करायें जाएँ और किसान मंडी में सही दाम में खेती की उपज को बेच पाए|इन सभी बातो को ध्यान में रखा जाए तो हमारे किसान परिवार भी खुश रह पाएंगे और कर्ज़ के अँधेरे से भी उन्हें निकाला जा सकेगा|

“न जाने कितनी जाने गई लेकिन किसी ने कुछ न कहा, मुझे  लगता है शायद लोगो को तुम्हारे फटे कपड़े , टूटी चप्पल और गरीबी पसंद नहीं|”   – गार्गी बोस

 

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Blog at WordPress.com.

Up ↑

%d bloggers like this: